याद है तुम्हे वे दिन…

याद है तुम्हे वे दिन,
जब तुम्ने स्कूल में पेहली बार कदम रखा था,
और पीछे मुड़कर अपनी माँ की तरफ देखा था ।
जब अपने बाएँ तरफ  एक रोती हुई लड़की को देखा था,
और अपने दाएँ तरफ एक हसती खिलखिलाती लम्बी लड़की को सीड़ियाँ चड़ते हुए देखा था ।

याद है तुम्हे वे दिन,
जब पहली बार तुम्हारी शिक्षिका ने तुम्हे एक कुर्सी से दूसरे कुर्सी पर कूदने पर डाटा था,
और पूरी कक्षा के सामने दीवार के तरफ मुँह करके खड़ा कर दिया था।
जब तुम्ने आँसुओं से भरी आँखों के साथ माँ को शिकायत की थी,
और तुम्हारी माँ ने प्यार से तुम्से कहा था, ‘किसने डाँटा मेरी बच्ची को’ ।

याद है तुम्हे वे दिन,
जब तुम गर्मी की जलती धूप से परेशान होकर प्यास से तड़प रही थी,
और तुम्ने स्कूल के नल में गरम पानी पाया था,
जब तुम्ने छुट्टी की घंटी सुनते ही सोचा, ‘मैं घर जाकर माँ के हाथों से ठंडा पानी पीउँगी’,
और घर पहुँचकर, ठंडे पानी का गिलास देखकर तुम्हे ऐसा लगा था जैसे तुम्हे दुनिया की सारी खुशियाँ  मिल  गईं हो ।

याद है तुम्हे वे दिन,
जब तुम्ने लंच ब्रेक में अपनी सहेलियों के डब्बे से खाना खाया था,
और अपना डब्बा वापस घर ले आई थी ।
जब माँ ने पूछा कि ‘ तुम्ने तो कुछ नहीं खाया, क्या तुम पूरे दिन भूकी थी?’
और तुम्ने जवाब दिया था कि ‘मेरी सहेली पास्ता लाई थी, मैंने वह खाया’ ।
***
याद है तुम्हे वे दिन,
जब तुम अपनी सखियों के साथ कक्षा के दौरान बात कर रही थी,
और शिक्षिका ने तुम्हारे बैठने का स्थान  अलग  कर दिया  गया था ।
जब मन-मन में न जाने तुम्ने उस शिक्षिका को कित्नी गालियाँ  दी थी,
और घर लौटकर तुम्ने और तुम्हारी सहेली ने फ़ोन पर उसी शिक्षिका पर एक घंटे तक चर्चे किए थे ।

याद है तुम्हे वे दिन,
जब हर परीक्षा के पिछले दिन, तुम और तुम्हारी सहेली पूरे किताब पर घंटा- दो घंटा वार्तालाप किया करते थे,
और स्कूल जाकर पूछते थे कि, ‘क्या तुम्हारी पढ़ाई हो गई’ ।
जब हर परीक्षा के पहले तुम अपनी सहेली से कहती थी, ‘मुझे यह विषय नहीं आता , मेरी मदद कर देना’,
और तुम्हारी सहेली तुम्हे जवाब देती थी, ‘मुझे तो कुछ भी नहीं आता, तुम भी मेरी मदद करना’।

याद है तुम्हे वे दिन,
जब शिक्षिका के कक्षा में न आने पर बहुत शोर मचती थी,
और उनके आते ही चुप्पी।
जब तुम अपनी सहेलियों के साथ अंताक्षरी खेला करती थी, चुटकुले सुनती थी,
और इतना हँसती थी, कि आँखों से आँसू ही निकल जाते थे।

याद है तुम्हे वे दिन,
जब हर छोटी बात पर तुम झगड़े करती थी बात-बात पर रूस जाती थी,
और घर आकर फ़ोन पर उन झगड़ों का हल निकालती थी, जब तक माँ खाने के लिए न बुलाए, फ़ोन पर ही लगी रहती थी ।
जब स्कूल में अपनी प्रिय सहेली के संग इशारों में बातें करती थी,
और बेवजह साथ में हँसने लगती थी ।
***
याद है तुम्हे वे दिन,
जब तुम सब शिक्षिकाओं के अंड-बंड नाम निकालकर, उनके बात करने के तरीके पर हँसते थे,
और बात-बात पर कक्षा से बाहर निकलने का मौका ढूंडते थे, बाहर निकलकर जी भरके बातें करते थे।
जब अंक की कक्षा में जान बूझकर देरी से जाते थे, शिक्षक के डाँटने पर बहाने बनाते थे,
और फिर इतना मज़ाक करते थे कि शिक्षक स्वयं ही हँस देते थे ।

याद है तुम्हे वे दिन,
जब कक्षा के दौरान तुम्हारी आँख लग जाती थी, शिक्षिका के क्रोध करने पर रात को देरी तक पढ़ने का बहाना बनाती थी,
और सहेलियों के साथ परियोजनाकार्य देरी से देती थी ।
जब शिक्षिका की एक शाबाशी पर फूली नहीं समाती थी, घर जाकर माँ को बताती थी,
और कक्षा की आखरी बेंच पर बैठकर न जाने कितने यादें बनाती थी ।

याद है तुम्हे वे दिन,
जब तुम सहेलियों के साथ सिनेमा देखने जाती थी,
और घूम फिरकर रात को देरी से घर पहुँचती थी ।
जब उनके साथ शाम को खूब फुचके खाती थी,
और घर लौटकर खाना न खाती थी ।

याद है तुम्हे वे दिन,
जब कक्षा के दौरान, तुम सब छुप-छुपकर चौकोलेट खाते थे,
और परीक्षा के दिन सबको पढ़ता देख घबरा जाते थे ।
जब परीक्षा की छुट्टियों में दिन रात पढ़ती थी, तब माँ हर घंटे कुछ खाने को लाकर देती थी,
और छोटी से छोटी बात पर सहेलियों के साथ खिलखिला कर हँसती थी ।
***
याद है तुम्हे वह स्कूल का आखरी दिन,
जब सब ज़ोर से चिल्ला रहे थे, यादें बना रहे थे,
और सब शिक्षिकाओं से अलविदा कह रहे थे ।
जब तुम अपने प्रिय शिक्षिका से गले लगा रही थी,
और अपने दोस्तों से न बिछड़ने का वादा किर रही थी ।
जब आँखों में आँसू लिए बाहर निकली थी,
और घूमकर एक आखरी बार अपने स्कूल को देखा था ।

इन पलों को यादकर, जी करता हैं इन्हें ही हर पल जीती रहूँ,
मगर, देखिए,
सब समय का खेल है,
कल हम स्कूल में प्रवेश करने से घबरा रहे थे, आज बाहर निकलने से घबरा रहे हैं ।
कल हम दोस्त बनाने में हिचकिचा रहे थे, आज दोस्तों से बिछड़ने में हिचकिचा रहे हैं ।
कल हम यादें बनाने के लिए जी रहे थे, आज हम यादों में जी रहे हैं ।

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49 thoughts on “याद है तुम्हे वे दिन…”

  1. कल हम यादें बनाने के लिए जी रहे थे, आज हम यादों मे जी रहे हैं l
    How much I miss our school life is indescribable. You’ve put it into words so well. *,*

    Liked by 1 person

      1. I’ve literally lost command and fluency in the language. It’s been two years since I left Hindi as a school subject and I find it really difficult to write down with fluency and good words. Your words are truly an encouragement. I’m honored.

        Liked by 1 person

  2. Yeh kavita toh har school ke textbook mai honi chaiye, khaas kar ke akhri saal mai ! Chaar line aapke liye likhta hoon : School khatam hojaati hain, yaadein saath reh jaati hain, aur kabhi kabhi aisi haseen kavita, yaadon ko fir taaza kar jaati hain ! Thank you for sharing such a wonderful poem, it made me nostalgic and was emotionally connected. Very nicely written, cheers 🙂

    Liked by 1 person

      1. Yes, your post does more than serve it’s purpose. It’s been over 10 years having left school and yet reading your poem I was back in the school days ! That’s the power of a good writer, allowing the reader to time travel by the tip or your pen (or shall I say by your fingertips on the keyboard ? 😉 )

        Liked by 1 person

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